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ISSN : 2231-4989

:: किसी भी भाषा के सर्वांगपूर्ण व्याकरण में उस भाषा के रूपांतरों और प्रयोगों का इतिहास लिखना आवश्यक है। - कामता प्रसाद गुरू (हिंदी व्याकरण, पृष्ठ-7) - ::

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भारतीय भाषाओं में राष्ट्रबोध की अवधारणा - वागीश राज शुक्ल

भारतीय भाषाओं में राष्ट्रबोध की अवधारणा - वागीश राज शुक्ल

भावाभिव्यक्तये प्रयुक्तानां सार्थकशब्दानां समष्टिरेव भाषा इति उच्यते अर्थात् भावाभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त सार्थक शब्दों की समष्टि ही भाषा कही जाती है । भावाभिव्यक्ति हेतु भाषा की महत्ता कितनी है, इसका उदाहरण हमें रामायण के सुन्दर कांड में उस समय दृष्टिगोचर होता है जब हनुमानजी को सोचने के लिए बाध्य होना पड़ता है यथा–

यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ।  रावणं मन्यमाना मां

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News: >>प्रकाशकीय नीति>>संकटग्रस्त भाषाओं के सर्वेक्षण का काम शुरू>> हेलो शब्द कहाँ से आया? >>देश की भाषाओं के लिए नई ऊर्जा से काम करने की आवश्यकता है